2024 आम चुनाव: कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न, नीतीश की NDA में वापसी और मोदी-शाह की रणनीति

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karpoori thakur nitish kumar modi

2024 General Elections: Bharat Ratna to Karpoori Thakur, Nitish’s return to NDA and Modi-Shah’s strategy

2024 आम चुनाव से ठीक पहले देश की राजनीति में एक बड़ा भूचाल आया। INDIA गठबंधन के जनक बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार NDA में शामिल हो गए। इस राजनीतिक घटनाक्रम से सभी भौचक्के रह गए। NITISH KUMAR के एनडीए में शामिल होने के क्या निहितार्थ हैं उसके बारे में इस लेख में आगे समझने की कोशिश करेंगे।

एक और घटना हुई जिसने हैरान तो नहीं किया लेकिन उसका प्रभाव व्यापक होगा। वो घटना है बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और सोशल जस्टिस के चैंपियन जन नायक स्वर्गीय कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न दिया जाना।

2024 में मार्च-अप्रैल में आम चुनाव होने हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तीसरी बार देश की कमान संभालने हर संभव कोशिश कर रहे हैं। नरेंद्र मोदी देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के तीन बार प्रधानमंत्री बनने के रिकॉर्ड को तोड़ना भी चाहते होंगे। मोदी ने अपनी पार्टी को 2019 की जीत से बड़ी जीत हासिल करने का लक्ष्य दिया है। लिहाजा सही रणनीति ही आम चुनाव में जीत दिला सकती है।

 

कर्पूरी ठाकुर Narendra Modi with Amit Shah

 

नरेंद्र मोदी और अमित शाह चुनावी रणनीति के माहिर खिलाड़ी माने जाते हैं। ये भी माना जाता है कि सोशल इंजीनियरिंग में इन्हें महारत हासिल है। जनता से कनेक्ट बनाने में मोदी माहिर हैं तो शाह छोटे-छोटे क्षेत्रीय दलों को अपने साथ लाने के एक्सपर्ट माने जाते हैं।

मोदी और शाह की खासियत ये है कि वो किसी भी चुनाव को हल्के में नहीं लेते हैं। रणनीति और संशाधनों का भरपूर इस्तेमाल करने में हिचकते नहीं हैं। पार्टी के हर कार्यकर्ता को इंगेज रखने के लिए चुनाव से काफी पहले ही सभी के पास वर्कशीट पहुंच जाती है। नेता छोटा हो या बड़ा काम सभी से लिया जाता है। चुनाव में पार्टी अपने संसाधनों का ऑप्टिमम उपयोग करती है। नेशनल से लेकर बूथ लेवल तक के हर नेता और कार्यकर्ता को एक तयशुदा काम मिलता है और उसकी डेडलाइन निश्चित की जाती है।

हाल ही में हुए इन दोनों घटनाक्रमों और मोदी-शाह की रणनीति को एक साथ करके देखने की जरूरत है। 2024 के आम चुनाव में बीजेपी को इसका फायदा निश्चित तौर पर मिलने वाला है। कैसे मिलेगा इसका फायदा, ये समझते हैं।
पहले बात पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न के असर की। इसके लिए हमें जननायक कर्पूरी ठाकुर के बैकग्राउंड को जानना होगा।

 

Karpoori Thakur कर्पूरी ठाकुर

कर्पूरी ठाकुर कैसे बने जननायक

कर्पूरी ठाकुर का 24 जनवरी 1924 को बिहार के समस्तीपुर जिले के एक गांव पितौंझियां में एक साधारण किसान परिवार में जन्म हुआ। कर्पूरी ठाकुर अति पिछड़े वर्ग की नाई जाति के थे। पढाई छोड़कर आजादी की लड़ाई में कूद गए। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लिया। करीब 26 महीने जेल में भी रहे। आजादी के बाद 1948 में आचार्य नरेंद्र देव और जय प्रकाश नारायण के प्रभाव में आकर समाजवादी पार्टी से जुड़े।

1952 में चुनाव लड़े औऱ जीते भी। कई दशकों तक वह विधायक रहे। वह हमेशा चुनाव जीते। संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी की सरकार में पहले वह उप-मुख्यमंत्री के साथ ही शिक्षामंत्री भी रहे और फिर 1970 में पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने। 1977 में एक बार फिर मुख्यमंत्री बने।

कट्टर इमानदार

आजकल के नेता एक बार विधायक हो जाने पर करोड़पति बन जाते हैं लेकिन कर्पूरी ठाकुर के पास दो बार मुख्यमंत्री रहने और दशकों विधायक रहने के बावजूद एक पक्का मकान तक नहीं था। अपने परिवार के लिए वह कोई संपत्ति छोड़कर नहीं गए। पहनने के लिए अच्छे कपड़े तक नहीं थे। उनकी मौत के बाद घर में उनके जो कपड़े मिले वो फटे हुए थे। इससे उनकी ईमानदारी का अंदाजा लगाया जा सकता है।

संवेदनशील जन नेता

उनके घर के दरवाजे सभी के लिए हमेशा खुले रहे। गरीब-अमीर, पक्ष-विपक्ष, कार्यकर्ता-नेता कोई भी हो सभी के लिए हमेशा वह उपलब्ध रहे। हर संभव सब की मदद करते थे।

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OBC को आरक्षण

आपातकाल के बाद 1977 में जब वो सरकार में आए तो उन्होंने मुंगेरीलाल समिति की रिपोर्ट के आधार पर ओबीसी के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण लागू किया। मंडल आयोग बाद में आया उससे पहले ही बिहार में कर्पूरी ठाकुर की सरकार ने आरक्षण लागू कर दिया था। ये फैसला भी बड़ा दिलचस्प था। उन्होंने इस फैसले को लेने से पहले अपने मंत्रिमंडल के सहयोगियों से भी सलाह नहीं ली थी। सवर्ण मंत्रियों ने पटना से लेकर दिल्ली तक काफी बवाल काटा। लेकिन बाद में सब मान गए और इस तरह बिहार में पिछड़ों और अतिपिछड़ों को सरकारी नौकरियों में 20 फीसदी आरक्षण उनकी सरकार ने लागू कर दिया।

अंग्रेजी को Bye-Bye

कर्पूरी ठाकुर जब उपमुख्यमंत्री और शिक्षामंत्री बने तो उन्होंने दसवीं तक पढ़ाई मुफ्त कर दी थी। स्कूल की परीक्षाओं में अंग्रेजी विषय में पास होने की अनिवार्यता को खत्म कर दिया। इससे गरीब और वंचित समाज के बच्चे बोर्ड की परीक्षाएं पास करके कॉलेज में पढ़ने लगे। इससे पहले बड़ी संख्या में ऐसे बच्चे बोर्ड की परीक्षाओं में फेल हो जाते थे और उनकी पढ़ाई वहीं खत्म हो जाती थी। अंग्रेजी विषय को पास करने की अनिवार्यता को खत्म करने से स्कूलों में एडमिशन बढ़ने लगे। समाज में इसका सकारात्मक असर पड़ा। कर्पूरी ठाकुर मानते थे कि अपनी मातृ भाषा में पढ़ाई करने से बच्चों को समझ में जल्दी आता है, सीखने में आसानी रहती है।

कर्पूरी ठाकुर जब बिहार के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने उर्दू को भी राजकीय भाषा का दर्जा दिया। सरकारी दफ्तरों में हिंदी में काम करने को अनिवार्य कर दिया।

लगान खत्म

कर्पूरी ठाकुर किसान परिवार से थे इसलिए वो किसानों के दर्द को समझते थे। इसीलिए उन्होंने कृषि क्षेत्र में भी बड़े ही क्रांतिकारी और किसान हितैषी कदम उठाए। उनकी सरकार ने छोटे किसानों का लगान खत्म कर दिया। फसल बर्बाद हो जाने, आपदा जैसी स्थितियों में भी लगान को माफ करने का प्रावधान कर दिया।

ऐसे बहुत से जनहित के फैसलों, गरीब, वंचित, शोषित समाज के प्रति उनकी संवेदनशीलता, बेहद सादगी भरे और निष्कलंक निजी आचरण ने कर्पूरी ठाकुर को सोशल जस्टिस का चैंपियन बना दिया और वो कहलाए जननायक कर्पूरी ठाकुर

जनता के नायक को भारत रत्न दिए जाने का लाभ निश्चित तौर पर मोदी सरकार को मिलेगा। कर्पूरी ठाकुर को चुनावी साल में भारत रत्न देना मोदी-शाह की एक बेहतर चुनावी रणनीति मानी जाएगी।

कर्पूरी ठाकुर की राजनीतिक विरासत

भारत रत्न कर्पूरी ठाकुर पर जयप्रकाश नायारण और डॉ लोहिया का प्रभाव रहा। लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान पर कर्पूरी ठाकुर को अपना राजनीतिक गुरु मानते हैं। हालांकि उनके सिद्धांतों पर इनमें से कोई चल नहीं सका। कर्पूरी ठाकुर ने अपने जीवनकाल में परिवार से किसी को राजनीति में नहीं आने दिया। उनके पास घर, गाड़ी या कोई दूसरी निजी संपत्ति भी नहीं थी। नीतीश कुमार को छोड़कर बाकी सभी के खानदान राजनीति में हैं। सभी मालामाल भी हैं।
जननायक कर्पूरी ठाकुर की इस विरासत के कई बटाईदार हैं। लेकिन अब भारत रत्न देकर बीजेपी भी बाकायदा सेंध लगा दी है।

 

Bihar Politics Nitish Kumar with Modi

नीतीश के NDA में शामिल होने का असर

नीतीश कुमार NDA में शामिल होना एक बड़ी राजनीतिक घटना है। इसके दूरगामी परिणाम देखने को मिलेंगे। इसे मोदी के नजरिए से समझिए। आखिरकार इससे मोदी को क्या और कितना फायदा होगा। नीतीश कुमार बड़े नेता हैं। साफ-सुथरी छवि है। उन पर भ्रष्टाचार का कोई दाग नहीं है। परिवारवाद का आरोप भी उन पर चस्पा नहीं होता क्योंकि उनके परिवार को कोई भी सदस्य राजनीति में नहीं है। भारत रत्न कर्पूरी ठाकुर के नक्शे-कदम पर चलने वाले नेता हैं।

सोशल इंजीनियरिंग के भी चैंपियन हैं। पिछड़े वर्ग और अतिपिछड़े वर्ग के सबसे बड़े नेता हैं। देश में कुर्मियों के सर्वमान्य सबसे बड़े नेता हैं। उनका प्रभाव न सिर्फ बिहार बल्कि झारखण्ड, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी है। पटेल बिरादरी बहुत ही प्रभावशाली और राजनीतिक तौर पर जागरूक जाति है। तमाम सीटों पर निर्णायक की भूमिका में भी है।

INDIA गठबंधन सिर्फ कागजी शेर

नीतीश कुमार के NDA में आने से INDIA गठबंधन अब कोई वजूद नहीं बचा है। गठबंधन के खत्म होने की महज औपचारिक घोषणा बाकी रह गई है। देश के तमाम छोटे बड़े दलों को नीतीश कुमार ही एक साथ लेकर आए थे। अब नीतीश के बाहर जाने से इस गठबंधन का भविष्य नहीं रहा। अपने अंतरविरोधों से ही ये गठबंधन खत्म हो जाएगा।

एक तीर से दो निशाने

नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने एक तीर से दो निशाने लगाए। नीतीश को NDA में लाने से एक तरफ बिहार को उन्होंने अपनी झोली में कर लिया। वहीं दूसरी तरफ INDIA गठबंधन को प्रभावहीन बना दिया। सीधे तौर पर इसका लाभ आगामी लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को मिलेगा। लोकसभा चुनावों में न सिर्फ बिहार में इसका असर दिखेगा बल्कि कई और प्रदेशों में भी चुनावी नतीजे प्रभावित होंगे।

बीजेपी ने पिछले लोकसभा चुनाव से बड़ा टार्गेट इस बार के लिए रखा है। संभव है कि अब वो अपने टार्गेट को अचीव कर लें। निहितार्थ यही निकलता है कि मोदी-शाह की रणनीति ने विपक्ष को चुनाव से पहले ही चारों खाने चित कर दिया है।

Mahendra Singhमहेंद्र सिंह, वरिष्ठ पत्रकार

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