भुज-द प्राइड ऑफ़ इंडिया, 50 साल बाद पर्दे पर महान शौर्य गाथा

भुज-द प्राइड ऑफ़ इंडिया,  50 साल बाद पर्दे पर महान शौर्य गाथा

समीक्षा – वी राय

भुज-द प्राइड ऑफ़ इंडिया. 13 अगस्त को ये फ़िल्म रिलीज़ हो रही है. अजय देवगन. संजय दत्त और सोनाक्षी सिन्हा जैसे स्टार्स ने इसमें प्रमुख भूमिकाएं निभाई हैं.

फ़िल्म का ट्रेलर 12 जुलाई को रिलीज़ हुआ है. चंद दिन में दसियों लाख लोग इसे देख चुके हैं.

फ़िल्म का प्लॉट भारत और पाकिस्तान के बीच साल 1971 में हुई लड़ाई पर आधारित है. ट्रेलर में एक्शन है. देशभक्ति ज़ाहिर करने वाले डायलॉग हैं. असंभव को संभव बना देने का जज्बा है. ये ट्रेलर एक ऐसी कहानी सामने ला देने का भरोसा देता है, जो पांच दशक बाद भी आपके दिल की गहराइयों में उतर जाएगी.

समीक्षकों ने इस ट्रेलर को मिक्स रेस्पॉन्स दिया है. मीडिया के एक तबके के मुताबिक ये ट्रेलर रिएलिटी से दूर है. ज़ोरदार बमबारी के बीच जब सब कुछ तबाह हो जाता है तो तिरंगे का लहराते रहना उन्हें खलता है. किरदारों का शायराना अंदाज़ में डायलॉग बोलना भी कुछ एक समीक्षकों को नहीं भाया. उनकी राय में भारतीय फ़िल्मों को ज़्यादा रिएलिस्टिक होना चाहिए. वो सवाल उठाते हैं कि आम ज़िंदगी में क्या कोई शेर-ओ-शायरी करते हुए बातचीत करता है. उनकी सलाह है कि जैसे लोग बोलते हैं डायलॉग भी वैसे ही लिखे जाने चाहिए.

ख़ैर, ये समीक्षकों की राय है. इसे मेकर्स और फ़ैन्स कैसे लेते हैं, ये उन पर ही निर्भर करेगा. हमारी राय में, भारत बहुत सी विविधता वाला देश है. बोलचाल के अंदाज़ में भी अलग-अलग जगह विविधता दिखती है. कई जगह लोग कहावत, शेर, शायरी, कविता और चौपाइयों में अपनी बातें कहते हैं. कई बार नारे आपको दूसरों के साथ जुड़ने में मदद करते हैं.

फ़िल्मों की बात करें तो कई लोगों को रिएलिस्टक सिनेमा पसंद आता है तो बहुत से ऐसे लोग भी हैं जिन्हें मसाला फ़िल्में लुभाती हैं. देशभक्ति की कहानियां बॉक्स ऑफ़िस पर कामयाबी की गारंटी भी देती है. इस तरह की फ़िल्में पसंद करने वालों को कलाकारों की भाषा और बोलने के अंदाज़ से तब तक ज़्यादा फर्क नहीं पड़ता जब तक भारत की जय-गाथा सुनाई जा रही हो और पाकिस्तान की हार की कहानी का दुहराव हो.

थियेटर में ऐसे तमाम डायलॉग पर ज़ोर ज़ोर से तालियां बजती हैं. ये फ़िल्म ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म पर रिलीज़ हो रही है और शायद इसीलिए बहुत से फैन्स चाहते हैं कि इसे थियेटर में रिलीज़ किया जाए.

हमें जो बात सबसे अच्छी लग रही है कि वो ये है कि इस फ़िल्म के जरिए गुजरात के भुज में शौर्य का नया कीर्तिमान रचने वाले समूह की कहानी आज की पीढ़ी तक पहुंचेगी.

साल 1971 की लड़ाई को करीब 50 साल बीत गए हैं. भारत ने पाकिस्तान पर जीत हासिल की ये बात सभी को पता है. पूर्वी पाकिस्तान अलग होकर बांग्लादेश बना ये भी जानकारी है लेकिन आज की पीढ़ी उस दौर की नायिकाओं और नायकों में से हर एक से परिचित नहीं हैं. जब युद्ध की कहानियों पर आधारित फ़िल्में बनती हैं तो वो हमारे सच्चे नायकों को ज़्यादा करीब ले आती हैं.

साल 1971 की जंग पर ही बनी जेपी दत्ता की फ़िल्म ‘बॉर्डर’ अब तक कई फैन्स की यादों में ताज़ा है. बॉर्डर फ़िल्म में 1971 की मशहूर ‘बैटल ऑफ़ लोंगेवाल’ को दिखाया गया था. इस फ़िल्म के जरिए तब मेजर रहे कुलदीप सिंह चांदपुरी और उनके साथी सैनिकों की बहादुरी घर-घर तक पहुंची. चांदपुरी का किरदार सनी देओल ने निभाया था.   

भुज-द प्राइड ऑफ़ इंडिया भी 1971 की जंग की एक सच्ची कहानी पर आधारित है. तब पाकिस्तान ने सीमा से लगते भुज एयरबेस पर बम बरसाए और हवाई पट्टी को तबाह कर दिया. एयरफोर्स के एक बहादुर अधिकारी ने बीएसएफ और पास के गांव माधापुर की करीब तीन सौ महिलाओं की मदद से सिर्फ़ तीन दिन में हवाई पट्टी को दोबारा तैयार कर दिया.

उस अभियान में हिस्सा लेने वाली महिलाओं को एयरफोर्स के तत्कालीन विंग कमांडर विजय कार्निक और स्थानीय प्रशासन ने प्रेरित किया था. भुज फ़िल्म में अजय देवगन कार्निक की भूमिका निभा रहे हैं.

ऑपरेशन का हिस्सा रहीं महिलाओं में से एक वालबाई सेघानी ने कुछ साल पहले ‘अहमदाबाद मिरर’ से बात की थी.

उनके मुताबिक तब तीन सौ महिलाएं एयरफ़ोर्स की मदद के लिए आईं थीं. वो ये सोचकर आईं थीं कि अगर हमारी जान भी चली जाती है तो ये सम्मान की बात होगी.

वहीं, एशियन एज़ ने स्क्वैड्रन लीडर कार्निक के हवाले से लिखा, “अगर तब किसी महिला की जान जाती तो हमारे लिए बड़ा नुकसान होता. लेकिन हमारे प्रयास रंग लाए. मैंने महिलाओं को बताया था कि अगर हमला होता है तो वो किस तरह अपना बचाव कर सकती हैं.”

हालांकि वालबाई ने उस दौर को याद करते हुए कहा था कि तब किसी भी महिला ने अपनी सुरक्षा के बारे में नहीं सोचा था.

उस अभियान में शामिल वीरू लछानी ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया को बताया था कि उन्हें ये बताया गया था कि अगर दुश्मन हमला करता है तो हवाई पट्टी को गाय के गोबर से ढक दें. काम करने के दौरान जब दुश्मन के हमले का संकेत देने के लिए सायरन बजता था तो वो बंकर में छुप जाते थे.

महिलाओं के मुताबिक पहले दिन उन्होंने भूखे रहते हुए काम किया. खाने के लिए कुछ नहीं मिला. दूसरे दिन आसपास के मंदिरों ने फल और मिठाई पहुंचाई और इसके सहारे वो तीसरे दिन काम कर पाईं. चौथे दिन सुबह चार बजे भारतीय वायु सेना के विमान उस हवाई पट्टी से उड़ान भरने को तैयार थे.

महिलाओं के मुताबिक ये उनके लिए गौरव का पल था. उस दौर की याद के लिए वहां एक वीरांगना स्मारक बनाया गया है.

भुज फ़िल्म यकीनन इस पूरी घटना की याद ताज़ा कराएगी और अगर इसमें थोड़ी बहुत नाटकीयता भी होती है तो लगता नहीं की देखने वालों को ज़्य़ादा शिकायत होगी.

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