भारत का हर पांचवां व्यक्ति मानसिक रोगी – WHO

भारत का हर पांचवां व्यक्ति मानसिक रोगी – WHO

मानसिक रोग का कितना खतरनाक हो सकता है इसका अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि अभी 14 नंवबर को, जिस महान शख्सियत और विश्वप्रसिद्ध गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह का निधन हुआ, वह 40 साल से मानसिक बीमारी सिज़ोफ्रेनिया से पीड़ित थे।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा जारी एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, तकरीबन 7.5 प्रतिशत भारतीय किसी-न-किसी रूप में मानसिक विकार से ग्रस्त हैं। साथ ही WHO के अनुमान के अनुसार, वर्ष 2020 तक भारत की लगभग 20 प्रतिशत आबादी मानसिक रोगों से पीड़ित होगी।

मानसिक रोगियों की इतनी बड़ी संख्या के बावजूद भी अब तक भारत में इसे एक रोग के रूप में पहचान नहीं मिल पाई है, आज भी यहाँ मानसिक स्वास्थ्य की पूर्णतः उपेक्षा की जाती है और इसे काल्पनिक माना जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि जिस प्रकार शारीरिक रोग हमारे लिये हानिकारक हो सकते हैं उसी प्रकार मानसिक रोग भी हमारे स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं।

मानसिक स्वास्थ्य क्या है ?

मानसिक स्वास्थ्य में हमारा भावनात्मक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कल्याण शामिल होता है। यह हमारे सोचने, समझने, महसूस करने और कार्य करने की क्षमता को प्रभावित करता है।

गौरतलब है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) अपनी स्वास्थ्य की परिभाषा में शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य को भी शामिल करता है।

मानसिक स्वास्थ्य समस्या और दुष्प्रभाव

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, वर्ष 2020 तक अवसाद (Depression) दुनिया भर में दूसरी सबसे बड़ी समस्या होगी। कई शोधों में यह सिद्ध किया जा चुका है कि अवसाद, ह्रदय संबंधी रोगों का मुख्य कारण है। मानसिक बीमारी कई सामाजिक समस्याओं जैसे- बेरोज़गारी, गरीबी और नशाखोरी आदि को जन्म देती है।

भारत में मानसिक रोग के मौजूदा हालात

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO ) के अनुसार, भारत में मानसिक रोगों से पीड़ित लोगों की सबसे अधिक संख्या मौजूद है। आँकड़े बताते हैं कि भारत में 15-29 वर्ष की आयु वर्ग के लोगों की मृत्यु का सबसे बड़ा कारण आत्महत्या है।

भारत में मानसिक स्वास्थ्यकर्मियों की कमी भी एक महत्त्वपूर्ण विषय है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, वर्ष 2011 में भारत में मानसिक स्वास्थ्य विकार से पीड़ित प्रत्येक एक लाख (100,000) रोगियों के लिये 0.301 मनोचिकित्सक और 0.07 मनोवैज्ञानिक थे।

वर्ष 2011 की जनगणना के आँकड़े बताते हैं कि भारत में तकरीबन 1.5 मिलियन लोगों में बौद्धिक अक्षमता और तकरीबन 722,826 लोगों में मनोसामाजिक विकलांगता मौजूद है। 2011 की जनगणना आँकड़ों से पता चलता है कि मानसिक रोगों से ग्रसित तकरीबन 78.62 फीसदी लोग बेरोज़गार हैं।

आंकड़े इस बीमारी की भयावहता को दर्शाने के लिए काफी हैं। इन सबके बावजूद भारत में मानसिक स्वास्थ्य पर किये जाने वाला व्यय कुल सरकारी स्वास्थ्य व्यय का मात्र 1.3 प्रतिशत है।

मानसिक विकारों के संबंध में जागरूकता की कमी भी भारत के समक्ष मौजूद एक बड़ी चुनौती है। देश में जागरूकता की कमी और अज्ञानता के कारण लोगों द्वारा किसी भी प्रकार के मानसिक स्वास्थ्य विकार से पीड़ित व्यक्ति को ‘पागल’ ही माना जाता है एवं उसके साथ उसकी इच्छा के विरुद्ध जानवरों जैसा बर्ताव किया जाता है।

भारत में मानसिक रूप से बीमार लोगों के पास या तो देखभाल की आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हैं और यदि सुविधाएँ हैं भी तो उनकी गुणवत्ता अच्छी नहीं है।

मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियाँ

आँकड़े दर्शाते हैं कि भारत में महिलाओं की आत्महत्या दर पुरुषों से काफी अधिक है। जिसका मूल घरेलू हिंसा, छोटी उम्र में शादी, युवा मातृत्व और अन्य लोगों पर आर्थिक निर्भरता आदि को माना जाता है। महिलाएँ मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से पुरुषों की अपेक्षा अधिक संवेदनशील होती हैं। परंतु हमारे समाज में यह मुद्दा इस कदर सामान्य हो गया है कि लोगों द्वारा इस पर ध्यान ही नहीं दिया जाता।

भारत में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी विकारों से जुड़ी सामाजिक भ्रांतियाँ भी एक बड़ी चुनौती है। उदाहरण के लिये भारत में वर्ष 2017 तक आत्महत्या को एक अपराध माना जाता था और IPC के तहत इसके लिये अधिकतम 1 वर्ष के कारावास का प्रावधान किया गया था। जबकि कई मनोवैज्ञानिकों ने यह सिद्ध किया है कि अवसाद, तनाव और चिंता आत्महत्या के पीछे कुछ प्रमुख कारण हो सकते हैं।

मानसिक स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों को संबोधित करने के लिये भी भारत के पास आवश्यक क्षमताओं की कमी है। आँकड़े बताते हैं कि वर्ष 2017 में भारत की विशाल जनसंख्या के लिये मात्र 5,000 मनोचिकित्सक और 2,000 से भी कम ​​मनोवैज्ञानिक मौजूद थे।

WHO के अनुसार, मानसिक स्वास्थ्य विकारों का सर्वाधिक प्रभाव युवाओं पर पड़ता है और चूँकि भारत की अधिकांश जनसंख्या युवा है इसलिये यह एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने आता है।

मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017

वर्ष 2017 में लागू किये गए इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य मानसिक रोगों से ग्रसित लोगों को मानसिक स्वास्थ्य सुरक्षा और सेवाएँ प्रदान करना है। साथ ही यह अधिनियम मानसिक रोगियों के गरिमा के साथ जीवन जीने के अधिकार को भी सुनिश्चित करता है।

परिभाषा

इस अधिनियम के अनुसार, ‘मानसिक रोग’ से अभिप्राय विचार, मनोदशा, अनुभूति और याददाश्त आदि से संबंधित विकारों से होता है, जो हमारे जीवन के सामान्य कार्यों जैसे- निर्णय लेने और यथार्थ की पहचान करने आदि में कठिनाई उत्पन्न करते हैं।

अधिकार

अधिनियम यह सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक व्यक्ति को मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच का अधिकार होगा।

अधिनियम में गरीबी रेखा से नीचे के सभी लोगों को मुफ्त इलाज का भी अधिकार दिया गया है।

अधिनियम के अनुसार, मानसिक रूप से बीमार प्रत्येक व्यक्ति को गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार होगा और लिंग, धर्म, संस्कृति, जाति, सामाजिक या राजनीतिक मान्यताओं, वर्ग या विकलांगता सहित किसी भी आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा।

मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को अपने मानसिक स्वास्थ्य, उपचार और शारीरिक स्वास्थ्य सेवा के संबंध में गोपनीयता बनाए रखने का अधिकार होगा।

मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति की सहमति के बिना उससे संबंधित तस्वीर या कोई अन्य जानकारी सार्वजानिक नहीं की जा सकती है।

अग्रिम निर्देश

मानसिक रोगों से ग्रसित व्यक्ति को यह बताते हुए अग्रिम निर्देश देने का अधिकार होगा कि उसकी बीमारी का इलाज किस प्रकार किया जाए तथा किस प्रकार नहीं और इस संदर्भ में उसका नामित प्रतिनिधि कौन होगा।

आत्महत्या अपराध नहीं है

आत्महत्या का प्रयास करने वाले व्यक्ति को मानसिक बीमारी से पीड़ित माना जाएगा एवं उसे भारतीय दंड संहिता के तहत दंडित नहीं किया जाएगा। इस अधिनियम ने भारतीय दंड संहिता की धारा 309 में संशोधन किया, जो पहले आत्महत्या को अपराध मानती थी।

विश्व बैंक का आकलन है कि दुनिया की 90 प्रतिशत स्वास्थ्य संबंधी ज़रूरतों को प्राथमिक स्तर पर ही पूरा किया जा सकता है, परंतु आँकड़े बताते हैं कि भारत में प्राथमिक स्तर पर स्वास्थ्य देखभाल का बुनियादी ढाँचा काफी कमज़ोर है। भारत में प्रत्येक 51000 लोगों पर मात्र एक ही प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र मौजूद है। अतः आवश्यक है कि अधिक संख्या में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों खोले जाएं।

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