नेहरू जिन्नाह की महत्वकांक्षा बनी लाखों बलिदानियों के अपमान का कारण, गांधी के सपने भी हुए चकनाचूर

नेहरू जिन्नाह की महत्वकांक्षा बनी लाखों बलिदानियों के अपमान का कारण, गांधी के सपने भी हुए चकनाचूर

विभाजन की विभीषिका और आजादी के अमृत महोत्सव पर इंद्रेश कुमार की कलम से

“14 अगस्त” यानी भारत विभाजन की विभीषिका दिवस..  और “15 अगस्त” यानी विभाजित भारत का स्वतंत्रता दिवस। सन 1857 से लेकर 1947 तक के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम, संकल्पों, जयघोषों और नारों के बीच की कथा भारत के 140 करोड़ लोगों और नौनिहालों तक को जानना जरूरी है। बात 1857 की… “मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी।” यानी भारत नहीं दूंगी। “फिरंगी मारो देश बचाओ, आजादी लाओ।” जन धारणा तैयार होने लगी कि अंग्रेज़ यानी फिंरंगी… कुटिल हैं, चालबाज हैं, षडयंत्रकारी हैं, धोखेबाज और अत्याचारी हैं… कुछ इस प्रकार से जनक्रान्ति आगे बढ़ी। फिर इस जनक्रांति में नया इतिहास जुड़ा। और वह था “संन्यासी आंदोलन – वन्देमातरम।” इसी कड़ी में आया “फकीर मलंग आंदोलन।” “एक ही सपना – अखंड रहे हिंद अपना।” फिर शुरुवात हुई “जनजातिय आंदोलन” की.. नारा आया – “भूरुटिए नी मानो रे नी मानो रे”… अंग्रेजों को भूरुटिए इसलिए कहते थे क्योंकि वह चालबाज हैं, सहज सरल, सज्जन नहीं बल्कि दुर्जन, अत्याचारी, आताताई और अन्यायी हैं। इसलिए एक नफरत भरा शब्द था भूरुटिया…।

इसके बाद जन आंदोलन आगे बढ़ता है। पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण – हर तरफ जाति मजहब भाषा प्रांत के लोग इस स्वतंत्रता संग्राम में अपनी आहुति देने के लिए सम्मिलित होते हैं। और फिर एक नया नारा उभरता है- “स्वदेशी अपनाओ, विदेशी भगाओ।” न विदेशी राज चलेगा, न विदेशी माल चलेगा, न विदेशी नियम कानून चलेंगे। चलेगा तो सिर्फ स्वदेशी देश चलेगा, स्वदेशी माल चलेगा, स्वदेशी नियम कानून चलेंगे।

ऐसी स्वराज की अवधारणा और विदेशियों को भगाने तथा स्वदेश और स्वदेशी लाने के लिए चौतरफा जनक्रांति आगे बढ़ी। फिर इसमें एक नया जयघोष संकल्प आया — “स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।” हम स्वतंत्रता लेकर रहेंगे। यानी रोटी कपड़ा मकान ही नहीं बल्कि स्वतंत्रता, सम्मान, स्वाभिमान और शिक्षा भी मूलभूत आवश्यकताएं हैं। इसका प्रतिपादन करते हुए धार्मिक सामाजिक सुधारों के साथ भारत का स्वतंत्रता संग्राम आगे बढ़ा।

उसी समय, देश के अंदर विदेशियों को न मानने के कारण सत्याग्रह के साथ- साथ एक नई और जोशीले क्रांति का जन्म भी हुआ। भारत का 15- 20 साल से लेकर 30-35 साल तक का नौजवान जान हथेली पर रख कर इस अंग्रेजी हुकुमत को उखाड़ फेंकने के लिए सर पर कफ़न बांध कर निकल पड़ा। आजादी के इन मतवाले नौजवानों और नौनिहालों को मरने में एक गौरव महसूस होता था। इसलिए यह क्रांति “लव फॉर डेथ” के रूप में चली। और एक नया नारा बना, “इंकलाब जिंदाबाद”… यानी अंग्रेजी शासन के विरुद्ध क्रांति का उदघोष जिसे अंग्रेजों ने बगावत कहा, परंतु हमने उसको स्वतंत्रता समर के रूप में देखा।

बढ़ते- बढ़ते फिर एक नया नारा लगा.. जो था “अंग्रेजों भारत छोड़ो”.. फिर अंतिम नारा भारत की स्वतंत्र सरकार हो, स्वतंत्र फौज हो, स्वतंत्र सारी सोच हो, स्वतंत्रता भी अखंड हो – इसलिए आवाज गरजी, “तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा – जयहिंद।”

अंतोगतवा अंग्रेजों के साथ देश के स्वतंत्रता संग्राम की वार्ता चली। परंतु महात्मा गांधी जी ने एक बहुत बड़ी चूक कर दी, जिसका दंश देश आज तक भुगत रहा है। वार्ता के लिए सुभाष, अरविंद और पटेल जाते तो भारत का विभाजन नहीं होता। परंतु अंग्रेजों से वार्ताकार के रूप में बापू के प्रतिनिधि बनकर नेहरू और जिन्नाह गए जिन्हें अंग्रेजों ने अपने षडयंत्रों का शिकार बना कर भारत का विभाजन कर दिया। विभाजन की इस विभीषिका में लगभग तीन करोड़ लोग दरबदर हुए, 10 से 12 लाख लोगों की हत्याएं हुईं, धरती खून से सन गई, मासूमों की रूह कांप उठीं, हजारों पूजा स्थल तोड़े गए, लाखों मां बेटियां अपना धर्म और अपनी आबरू बचाने की खातिर आत्महत्या के रूप में बलिदान देने को मजबूर हुईं। इंसानियत शर्मसार हुई। लाखों लोगों के लिए जिंदगी मौत से बदतर बन गई। अंग्रेजों के छल कपट, नेहरू और जिन्नाह की महत्वकांक्षा और गांधी जी की एक गलती के कारण ऐसा दुखदायी यह विभाजन हुआ। इसके कारण जो लाखों लाख बलिदान हुए उन सब का भी घोर अपमान हुआ और गांधी का जो सपना था स्वराज और अखंड भारत का वो सभी चकनाचूर हो गए।

वहीं से विभाजित भारत का स्वतंत्रता सफर भी प्रारंभ हुआ। 75 वर्षों में हुआ जो कुछ हुआ वह सब जानते हैं। परंतु आज देश के अंदर और बाहर ऐसी सियासी, मजहबी ताकतें हैं जो जाति के नाम पर, मजहब के नाम पर, दल के नाम पर, भाषा – भूगोल आदी के नाम पर भारत को बांटने, भड़काने और लड़वाने में लगी हैं। और ऐसे में अनेक मंत्रों में से एक मंत्र आया है, “घर घर तिरंगा, गली मुहल्ला तिरंगा, दुकान- फैकट्री- ऑफिस तिरंगा, मार्केट बाजार तिरंगा, खेत खलिहान तिरंगा, चौक चौराहा तिंरगा, हर घर तिरंगा, हर हाथ तिरंगा।”

इस प्रकार से तिरंगामयी भारत बनाना और 140 करोड़ भारतीयों को आपस में जोड़ना सुखद और सफल भारत की एक परिकल्पना है। यानी कुल मिला कर – भारत जोड़ता है। भारत, भारतीय और भारतीयता के लिए आन बान शान है तिरंगा। तिरंगे के लिए जीना और मरना स्वर्ग समान है। इस प्रकार का भाव जनजन में आए। एकजुट भारत बने। श्रेष्ठ, शिक्षित, विकसित, शक्तिशाली और महान भारत बने। ऐसा भारत बनाने का एक संकल्प देश के जन- जन में आए। हमारी ऐसी प्रतिज्ञा होनी चाहिए कि इस प्रकार का एक स्वाभिमान लेकर हम खुद भी बनेंगे और भारत को भी बनाएंगे, देश को चमकायेंगे। आजादी के अमृत महोत्सव पर हमारा यह आह्वान होना चाहिए की विश्व को युद्धों, अपराधों और दंगों से मुक्त बना कर मजबूती से आगे बढ़ेंगे।

इसी विश्वास के साथ जिन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम और फिर बाद में सीमा की रक्षा के लिए बलिदान दिया उन सभी को शत शत नमन करते हुए हार्दिक श्रद्धांजलि। ऐसी कामना है कि आगे के लिए सब स्वास्थ्य रहें, प्रसन्न रहें, मिलजुल कर रहें और अपने भारत को श्रेष्ठ भारत बनाने में जुटें। जाति, मजहब, दल, भाषा, प्रांत ऐसी सारी विविधताओं और अनेकताओं से ऊपर उठ कर हम सब मिल कर गुंजाएं – भारत माता की जय, एक हिंद जय हिंद। वन्देमातरम। मादरे वतन हिंदुस्तान ज़िंदाबाद। जय हिंद, जय भारत। आजादी का अमृत महोत्सव मुबारक।

(लेखक आरएसएस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य और मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के मुख्य संरक्षक हैं)

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