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इंटरनेट शटडाउन :अधिकारों का हनन या समस्या का समाधान

इंटरनेट शटडाउन :अधिकारों का हनन या समस्या का समाधान

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हम सब की जिंदगी में इंटरनेट की कितनी अहमियत है उसे यदि शब्दों में व्यक्त किया जाए तो ये कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि इंटरनेट अब जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। बिना इंटरनेट सब कुछ अधूरा सा लगता है। हम दुनिया से अलग-थलग पड़ जाते हैं। जिंदगी नीरस लगने लगती है। तो आइए इंटरनेट शटडाउन और उसके कानूनी, सामाजिक और आर्थिक पहलुओं को खंगालने की कोशिश करते हैं।    

क्या होता है इंटरनेट शटडाउन’?

इंटरनेट शटडाउन को यदि परिभाषित करें तो ऐसा कहा जाएगा कि एक निश्चित समयसीमा के लिये सरकार द्वारा एक या एक से अधिक इलाकों में इंटरनेट सेवा को बंद करना इंटरनेट शटडाउन कहलाता है। इसे उदाहरण सहित कुछ इसतरह समझें। असामान्य परिस्थितियों में हिंसक घटनाओं और अफवाहों को रोकने के लिए प्रशासन इंटरनेट बंद करने का फैसला लेता है। जैसा कि जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को हटाने के वक्त सुरक्षा की दृष्टि से अफवाहों और हिंसक घटनाओं को रोकने के लिये सरकार ने इंटरनेट सेवा बंद कर दी। नागरिकता संशोधन अधिनियम- 2019 और एनआरसी के विरोध प्रदर्शनों के चलते देश के कई इलाकों में प्रशासन ने समय-समय पर इंटरनेट शटडाउन का फैसला लिया।

इंटरनेट शटडाउन हमेशा सरकार द्वारा किया जाता है। सरकार की एक निश्चित एजेंसी इंटरनेट सेवा देने वाली कंपनियों को किसी क्षेत्र विशेष में इंटरनेट सेवाओं को बंद करने का आदेश देती है।

इंटरनेट शटडाउन सदैव किसी एक विशेष क्षेत्र में लागू किया जाता है, जहाँ एक क्षेत्र विशेष के सभी लोग इंटरनेट का प्रयोग नहीं कर पाते हैं। कई बार इंटरनेट शटडाउन किसी क्षेत्र विशेष में लागू न करके इसे इंटरनेट पर मौजूद कुछ चुनिंदा सामग्रियों पर लागू किया जाता है और आम जनता तक उनकी पहुँच प्रतिबंधित कर दी जाती है।

इंटरनेट शटडाउन की राजधानी है भारत

इंटरनेट फ्रीडम के क्षेत्र में काम कर रही संस्थाओं द्वारा जारी आँकड़ों के अनुसार, 2014 से अब तक देश भर में करीब 357 बार इंटरनेट शटडाउन देखा गया। 2014 में देश भर में इंटरनेट शटडाउन की संख्या मात्र 6 थी जो वर्ष 2015 में बढ़कर 14 हो गई। 2016 और 2017 में इंटरनेट शटडाउन की संख्या क्रमशः 31 और 79 हुई। 2018 में बढ़कर 134 हो गई। वर्ष 2019 में अब तक भारत में कुल 100 बार इंटरनेट बंद करने की घोषणा की गई, जिसके कारण कुल 167 क्षेत्र प्रभावित हुए।

आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, साल 2018 में दुनिया भर में हुए कुल इंटरनेट शटडाउन में से लगभग 67 फीसदी भारत में दर्ज किये गए। भारत में हुए कुल इंटरनेट शटडाउन में से तकरीबन 56 प्रतिशत (अर्थात् कुल 53) शटडाउन केवल जम्मू-कश्मीर में ही देखे गए, जिसमें कुल 93 क्षेत्र प्रभावित हुए। जम्मू-कश्मीर के बाद राजस्थान में सबसे अधिक 18 बार इंटरनेट शटडाउन देखा गया। आँकड़ों से साफ है कि भारत दुनिया भर में इंटरनेट शटडाउन की राजधानी बन गया है।

इंटरनेट शटडाउन संबंधी कानून

1.सीआरपीसी (CrPC) की धारा 144

धारा 144 जिला मजिस्ट्रेट, उप-विभागीय मजिस्ट्रेट या राज्य सरकार द्वारा सशक्त किसी कार्यकारी मजिस्ट्रेट को हिंसा या उपद्रव की आशंका पर उसको रोकने से संबंधित प्रावधान करने का अधिकार देती है। मजिस्ट्रेट लिखित आदेश जारी करके किसी व्यक्ति विशेष या क्षेत्र विशेष में रहने वाले व्यक्तियों के लिये, अथवा आम तौर पर किसी विशेष स्थान या क्षेत्र में आने या जाने वाले लोगों के लिये इसे निर्देशित करता है। आपातकालीन स्थतियों में मजिस्ट्रेट बिना किसी पूर्व सूचना के भी ऐसे आदेश जारी कर सकता है।

आँकड़े पर गौर करें तो जनवरी 2012 और अप्रैल 2018 के बीच भारत में दर्ज किये गए अधिकांश इंटरनेट शटडाउन का आदेश सीआरपीसी (CrPC) की धारा 144 के तहत ही दिया गया था। हालाँकि सीआरपीसी (CrPC) की धारा 144 में इंटरनेट शटडाउन के लिये कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं किया गया। इंटरनेट शटडाउन का आदेश इस धारा की व्याख्या के आधार पर दिया जाता है।

2.भारतीय टेलीग्राफ अधिनियम, 1855 की धारा 5(2)

हालांकि देश में इंटरनेट पर पाबंदी के लिये सीआरपीसी (CrPC) की धारा 144 का ही अब तक सबसे अधिक इस्तेमाल किया गया है लेकिन टेलीग्राफ अधिनियम 1855 की धारा 5(2) का भी इंटरनेट सेवाओं को रोकने के लिए कई बार इस्तेमाल किया जाता है।

भारतीय टेलीग्राफ अधिनियम – 1855 भारत में वायर्ड और वायरलेस टेलीग्राफी, टेलीफोन, टेलेटाइप, रेडियो संचार और डिजिटल डेटा संचार के उपयोग को नियंत्रित करता है। इसकी धारा 5(2) सीआरपीसी ( CrPC) की धारा 144 के समान ही है। हालांकि इसमें भी इंटरनेट शटडाउन के लिये कोई विशेष प्रावधान नहीं किये गए हैं, परंतु धारा की व्याख्या के आधार पर इस प्रकार के आदेश दिये जा सकते हैं।

3.दूरसंचार अस्थायी सेवा निलंबन (लोक आपात या लोक सुरक्षा) नियम, 2017

इस नियम के अंतर्गत देश के गृह मंत्रालय के सचिव या राज्य के सक्षम पदाधिकारी को दूरसंचार सेवाओं के निलंबन का अधिकार दिया गया है।

इंटरनेट शटडाउन का प्रभाव

अर्थव्यवस्था पर प्रभाव : इंटरनेट शटडाउन के कारण विभिन्न देशों को हुए नुकसान का आकलन ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूट द्वारा किया गया। इस संस्था की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत को वर्ष 2016 में इंटरनेट शटडाउन के कारण तकरीबन 968 मिलियन अमेरिकी डॉलर का नुकसान हुआ था। देश में बड़े पैमाने पर ऑनलाइन बिज़नेस कंपनियां काम कर रही हैं। इन व्यवसायों को कुछ घंटों के शटडाउन के कारण ही काफी करोड़ों के नुकसान का सामना करना पड़ता है। डिजिटल इंडिया को इससे बहुत बड़ा धक्का लगता है।

शिक्षा पर प्रभाव : इंटरनेट को हम लोग कई बार सिर्फ सोशल मीडिया अर्थात व्हाट्सएप, फेसबुक या ट्विटर तक ही सीमित कर देते हैं। जबकि सच्चाई ये है कि इंटरनेट सिर्फ इन्हीं तक सीमित नहीं है। इंटरनेट ज्ञान का खजाना है। जहाँ लगभग सभी विषयों का भरपूर कंटेंट मौजूद है। तमाम ऑनलाइन एडुकेशनल कंपनिया इंटरनेट पर करोड़ों बच्चों को पढ़ा रही हैं। ऐसे में जब किसी क्षेत्र विशेष में लंबे समय तक इंटरनेट शटडाउन जारी रहता है तो छात्रों पर इसका बहुत प्रभाव पड़ता है।

मानवाधिकार पर प्रभाव : दुनिया के कई देशों में इंटरनेट शटडाउन का इस्तेमाल विशेष परिस्थितियों से निपटने के लिए एक हथियार को तौर पर किया जा रहा है। ये ट्रेंड काफी भयावह है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस पर गंभीर आपत्ति जताई है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने 1 जुलाई, 2016 को एक प्रस्ताव पारित किया था। इसमें ऑनलाइन सूचना के प्रसार पर अंकुश लगाने के लिये विभिन्न राष्ट्रों द्वारा किये गए इंटरनेट व्यवधानों और उपायों की निंदा की गई। इस प्रस्ताव में कहा गया है कि ऑनलाइन क्षेत्र में अधिकार, विशेष रूप से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार, की रक्षा करने के लिए नए कानून बनाने की आवश्यकता है।

इंटरनेट शटडाउन अनुचित क्यों?

एक बड़ा और गंभीर सवाल ये है कि बार-बार इंटरनेट बंद कर देना कितना सही है। वह भी तब, जब सरकार देश को डिजिटल इंडिया बनाने का सपना देख रही है। इंटरनेट पर रोक लगाने से देश को आर्थिक नुकसान तो होता ही है, नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार भी खतरे में आ जाता है।

आज के दौर में व्यावसायिक से कहीं अधिक निजी संबंध डिजिटल कम्युनिकेशन पर निर्भर करते हैं। ऐसे में इंटरनेट बंद होना बेहद असुविधाजनक और असुरक्षा की भावना पैदा करने वाला है। हालांकि विशेष परिस्थितियों में धार्मिक समूहों में अफवाह के कारण टकराव की संभावना को टालने के लिये ऐसा करना गलत नहीं कहा जा सकता है। इन सबके बावजूद इंटरनेट शटडाउन स्पष्ट रूप से सभी लोगों के लिये असुविधाजनक और हानिकारक है।

सरकारों को इंटरनेट शटडाउन से समाज के विभिन्न तबकों पर पड़ने वाले तमाम प्रभावों के बारे में गंभीरता से आकलन करना चाहिए। क्योंकि कई बार इसके कारण विभिन्न क्षेत्रों पर ऐसा प्रभाव पड़ता है जिसके कारण देश को काफी आर्थिक और सामाजिक नुकसान का सामना करना पड़ सकता है। जरूरी ये है कि इंटरनेट शटडाउन को प्राथमिक विकल्प के रूप में न देखा जाए, बल्कि किसी भी विशेष मुद्दे को सुलझाने के लिये सरकार को अन्य सभी विकल्पों पर भी गंभीरता से विचार करना चाहिये।

लेखक- महेन्द्र सिंह, वरिष्ठ पत्रकार

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