शिक्षा में सब्सिडी : निवेश या बोझ

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शिक्षा खासतौर पर उच्चतर शिक्षा में सब्सिडी दी जाए या नहीं इस पर काफी विवाद रहा है। हाल ही में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में फीस बढ़ोत्तरी पर हो रहे छात्र आंदोलन ने शिक्षा में सब्सिडी दिए जाने के मुद्दे को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। इस मुद्दे को समझने के लिए हमें सबसे पहले अपने देश को समझने की आवश्यकता है। लोगों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति को समझना होगा।

2011-12 की जनगणना के मुताबिक, भारत के ग्रामीण इलाकों में 25.7 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 13.7 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन कर रही है। अर्थात समाज का बड़ा हिस्सा गरीब है। आर्थिक असमानता का शिकार है। अपने हक से वंचित है। ऐसे में ये कहना कि शिक्षा पर दी जाने वाली सब्सिडी से देश की अर्थव्यवस्था पर बोझ पड़ता है, गरीबों के साथ एक और अन्याय से कम नहीं होगा। कई विश्लेषक मानते हैं कि यदि हम आर्थिक असमानता को दूर कर सभी नागरिकों को बेहतर शिक्षा देना चाहते हैं तो शिक्षा पर सब्सिडी को एक अच्छे विकल्प के रूप में देखा जाना चाहिए।

शिक्षा में सब्सिडी की जरूरत क्यों ?

भारत के पास बड़ी संख्या में युवा जनसंख्या मौजूद है। परंतु सर्वेक्षणों से पता चलता है कि अधिकांश युवाओं में शैक्षणिक और कौशल दक्षता बाज़ार की आवश्यकताओं के अनुसार नहीं है। हमें यदि इस युवा आबादी को सब्सिडी देकर शिक्षित कर सके तो ये आबादी देश के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री और नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन का कहना है कि देश के विकास और उसकी आर्थिक प्रगति में शिक्षा का काफी योगदान होता है। शिक्षा हमें जीने का एक नया नज़रिया देती है और जीवन जीने के स्तर में भी सुधार करती है। आर्थिक विकास और शिक्षा के बीच संबंध पर बांग्लादेश के एक शोधकर्त्ता ने अपने अध्ययन में पाया कि शिक्षा में सार्वजनिक खर्च का आर्थिक विकास पर सकारात्मक और महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। अध्ययन के अनुसार,

यदि किसी देश की सरकार शिक्षा पर 1 प्रतिशत अधिक खर्च करती है तो उस देश की प्रति व्यक्ति GDP में तकरीबन 0.34 प्रतिशत की वृद्धि देखी जा सकती है।

यह सर्वविदित है कि शिक्षा किसी भी प्रकार से देश और समाज के विकास में बाधा नहीं बन सकती है। बल्कि उच्चतर शिक्षा में सब्सिडी समाज के हाशिये पर पड़ी बड़ी आबादी को देश के विकास में भागीदार बनाती है। उच्चतर शिक्षा में छात्र विभिन्न शोधों और अनुसंधानों में हिस्सा लेते हैं और अपने-अपने स्तर पर अर्थव्यवस्था में योगदान देने का प्रयास करते हैं। उल्लेखनीय है कि उच्चतर शिक्षा नवाचार और रचनात्मक सोच को बढ़ावा देती है। कई जानकार सब्सिडी युक्त शिक्षा को अर्थव्यवस्था में भविष्य के निवेश के रूप में देखते हैं। उनका मानना है कि यदि हम शिक्षा पर सब्सिडी प्रदान नहीं कर रहे हैं तो हम स्पष्ट रूप से देश के भविष्य की उपेक्षा कर रहे हैं।

शिक्षा सभी का बुनियादी हक है। हालांकि कुछ समय पहले तक यह माना जाता था कि उच्चतर शिक्षा पर मात्र कुलीन वर्ग का ही अधिकार है। ऐसे में सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़े गरीब बच्चे उच्चतर शिक्षा से वंचित रह जाते थे। परंतु जब से उच्चतर शिक्षा में सब्सिडी और अन्य लाभ मिलने लगे तब से तमाम ऐसे छात्र भी आज उच्च शिक्षण संस्थानों में पहुँच रहे हैं, जो बेहद गरीब परिवारों से हैं और जिनके परिजन मजदूरी करके जीवन का गुजारा कर रहे हैं।

दरअसल शिक्षा पर सरकारों के ध्यान न देने की वजह से शिक्षा का तेजी से निजीकरण हुआ। निजी संस्थान आम लोगों तक सस्ती और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की पहुँच प्रदान करने के लिये उत्तरदायी नहीं होते हैं। उनका एकमात्र उद्देश्य इसके माध्यम से लाभ कमाना होता है।

शिक्षा पर सब्सिडी प्रदान करने का मुख्य उद्देश्य समाज के हाशिये पर मौजूद लोगों को आर्थिक लाभ देकर समाज की मुख्यधारा से जोड़ना है। हालाँकि कभी-कभी यह देखा जाता है कि वे लोग भी इस प्रकार की सब्सिडी का लाभ उठा लेते हैं जिन्हें इसकी ज़रूरत नहीं होती, जिसके कारण ज़रूरतमंद लोगों तक लाभ नहीं पहुँच पाता है।

शिक्षा में सब्सिडी का असमान वितरण भी एक बड़ी समस्या है। आँकड़े बताते हैं कि देश में अधिकांश शिक्षा सब्सिडी कुछ ही बड़े संस्थानों को जाती है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा बीते वर्ष उच्चतर शिक्षा की सब्सिडी के संबंध में जो आँकड़े जारी किये गए थे उनसे पता चलता है कि वर्ष 2016 से 2018 के मध्य उच्चतर शिक्षा के लिये दिया गया केंद्र सरकार का 50 प्रतिशत से अधिक धन IITs, IIMs और NITs में पढ़ने वाले मात्र 3 प्रतिशत छात्रों को मिला। जबकि 865 उच्च शिक्षण संस्थानों में पढ़ने वाले 97 प्रतिशत छात्रों को आधे से भी कम धन मिला।

सब्सिडी में अव्वल देश

डेनमार्क अपनी कुल जीडीपी का करीब 0.6 प्रतिशत हिस्सा उच्चतर शिक्षा के छात्रों की सब्सिडी पर खर्च करता है। गौरतलब है कि वहाँ कुल 55 प्रतिशत युवा विश्वविद्यालयों में पढ़ाई करते हैं।

फिनलैंड भी अपने छात्रों को उनकी शिक्षा और अन्य खर्चों के लिये तमाम छात्रवृत्तियाँ और अनुदान देता है। वहाँ तकरीबन 69 प्रतिशत युवा विश्वविद्यालयों में पंजीकृत हैं।

आयरलैंड वर्ष 1995 से ही अपने अधिकांश पूर्णकालिक स्नातक छात्रों की ट्यूशन फीस का भुगतान करता है।

आइसलैंड की सरकार अपने छात्रों पर सालाना औसतन 10,429 डॉलर खर्च करती है और वहाँ तकरीबन 77 प्रतिशत युवा उच्चतर शिक्षा के लिये पंजीकृत हैं।

नार्वे उच्चतर शिक्षा पर सब्सिडी के लिये अपनी GDP का 1.3 प्रतिशत हिस्सा खर्च करता है जो कि विश्व में शिक्षा पर किया जाने वाला सबसे अधिक खर्च है। यहाँ भी तकरीबन 77 प्रतिशत छात्र उच्चतर शिक्षा में पंजीकृत हैं।

उच्चतर शिक्षा में भारत की स्थिति

भारत की बात करें तो मानव संसाधन विकास मंत्रालय (MHRD) के आँकड़ों के अनुसार, वर्तमान में देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में तकरीबन 2 करोड़ से अधिक छात्र पंजीकृत हैं। मंत्रालय का ही अखिल भारतीय उच्चतर शिक्षा सर्वेक्षण बताता है कि 18-23 वर्ष के मात्र 25.8 प्रतिशत छात्र ही उच्चतर शिक्षा के लिये पंजीकृत हो पाते हैं।

2019 की सुप्रसिद्ध क्यूएस वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग में केवल सात भारतीय विश्वविद्यालयों को शीर्ष 400 विश्वविद्यालयों में स्थान प्राप्त हुआ था। जाहिर है विश्वगुरू बनने चले भारत के लिए ये बड़ी ही शर्मनाक स्थिति है।

समाज और सरकार दोनों को यह समझना होगा कि शिक्षा एक बेहतर भविष्य की कुंजी होती है। यह न केवल हमारे व्यक्तिगत विकास में योगदान देती है, बल्कि देश और समाज के विकास में भी इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। यही नहीं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करना देश के प्रत्येक नागरिक का विशेषाधिकार भी है। इससे नागरिकों अपने कानूनी अधिकार की समझ बढ़ती है, वर्ग विभाजन तथा गैर बराबरी जैसी सामाजिक बुराइयों को खत्म करने में मदद मिलती है। अतः आवश्यक है कि किसी भी कीमत पर देश में उच्चतर शिक्षा को बढ़ाया जाए ताकि देश के बेहतर भविष्य को सुनिश्चित किया जा सके।

लेखक – महेन्द्र सिंह, वरिष्ठ पत्रकार

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