• एकोअहम् द्वितीयोनास्ति – आचार्य श्री होरी

    एकोअहम् द्वितीयोनास्ति – आचार्य श्री होरी0

    अब आप चिंतन करें। जब मैं और वह एक हैं, यानी आपमें इसमें उसमें वही विद्यमान है तो उसे बाहर क्यों खोजते हैं?  मूर्तियों, देवी देवताओं, चित्रों में खोजने से अच्छा है भटकाव बंद कर अप्प दीपो भव कहें  या तत् त्वम् असि कहें या सोअहम् कहें या कहें अहम् ब्रह्मास्मि। बात समानार्थी है। बुद्ध

    READ MORE
  • करें स्वस्थ जगत का चिंतन-आचार्य श्री होरी

    करें स्वस्थ जगत का चिंतन-आचार्य श्री होरी0

    आदि मानव जंगल में पशु, पक्षियों के मध्य रहता था। उसके मस्तिष्क से विकास बीज प्रस्फुटित होकर वृक्ष बनना आरंभ हुआ। उसने गांव, नगर बसाए। अनेक सभ्यताएं और संस्कृतियां विकसित कीं । इसके लिए मस्तिष्क को लगातार शिक्षित किया उसने। ज्ञान, कर्म और भक्ति से एक सुरम्य संसार बनाया और हिंसा से बिगाड़ा भी। उसके

    READ MORE
  • विज्ञानमय धर्म ही सत्य, बाक़ी सब मिथ्या – आचार्य श्री होरी

    विज्ञानमय धर्म ही सत्य, बाक़ी सब मिथ्या – आचार्य श्री होरी0

    धर्म में वैज्ञानिक दृष्टि का क्या आशय है इस लेख में इसे समझेंगे। सबसे पहले हमें विज्ञान को समझना होगा । विज्ञान भी मनुष्य के मस्तिष्क का एक अंश है । किसी में अधिक विकसित है तो किसी में कम । धर्म दर्शन अध्यात्म भी मनुष्य के मस्तिष्क में विद्यमान हैं । यहां विज्ञान का

    READ MORE

Latest Posts

Top Authors