मानवजगत को जगाती मूलचंद मित्तल की ‘सामान्य जीवन ज्ञान एवं धर्म उपदेशिका’

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नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली की सरजमीं पर एक बड़ी ही रोचक और अद्भुत पुस्तक का लोकार्पण हुआ। यह पुस्तक अपने आप मेंसमेटे हुए है एक युग को जिसमें संवेदना भी है और सौहार्द भी, समरसता भी सात्विकता भी। पुस्तक के रचयिता 89 वर्षीय इंजीनियरमूलचंद मित्तल ने अपने जीवन को आर्य समाज के साधक, शोधक, विचारक एवं इतिहासकार की तरह झोंक दिया है एक ऐसी तपतीभट्टी में जिससे निकल के गुरुत्व के रूप से गुजरता कुंदन तैयार होता है।

पुस्तक का शीर्षक है सामान्य जीवन ज्ञान एवं धर्म उपदेशिका। पुस्तक का लोकार्पण दिल्ली बीजेपी के वरिष्ठ नेता और विधायकविजेंद्र गुप्ता ने किया। इस मौके पर शहर के अनेकों बुद्धिजीवियों और गणमान्य व्यक्तियों की मौजूदगी रही। लेखक मूलचंद जी कीबेटियां नीलम गुप्ता और निशी अग्रवाल के साथ साथ बेटे अजय कुमार मित्तल, संजय कुमार मित्तल और विजय कुमार मित्तल मौजूदरहे। साथ ही मूलचंद मित्तल की नातिन और पोतियां भी ऐतिहासिक समय की साक्षी रहीं

पुस्तक का नाम भले ही सामान्य ज्ञान है परंतु हर रूप से यह पुस्तक असमान्य है जिसमें व्यक्ति को मिलता है जीवन जीने का अद्भुत, अद्वितीय, अकल्पनीय अमृत का सागर। पुस्तक अपने आप में एक धरोहर है जो मानव विकास एवं कल्याण के लिए इंजीनियर मूलचंदमित्तल ने जनहित में तैयार किया है।

पुस्तकसामान्य जीवन ज्ञान एवं धर्म उपदेशिकाकी विषय सूची में मानव जगत और मानव कल्याण से जुड़े 78 बिंदुओं पर प्रकाशडाला गया है। और हर एक बिंदु जीवन के अनमोल विचार और रहस्यों को चरितार्थ करता है। लेखक के ऐसे विचार का मुख्य कारण हैउनका सादा जीवन और उच्च विचार को प्रमुखता देना।

यह पुस्तक आर्य समाज को केंद्रित करते हुए लिखी गई है। आर्य समाज एक हिन्दू सुधार आन्दोलन है जिसकी स्थापना स्वामी दयानन्दसरस्वती ने 1875 में बंबई में मथुरा के स्वामी विरजानन्द की प्रेरणा से की थी। यह आन्दोलन पाश्चात्य प्रभावों की प्रतिक्रिया स्वरूपहिंदू धर्म में सुधार के लिए प्रारम्भ हुआ था।

आर्य समाज में शुद्ध वैदिक परम्परा में विश्वास करते थे तथा मूर्ति पूजा, अवतारवाद, बलि, झूठे कर्मकाण्ड अन्धविश्वासों कोअस्वीकार करते थे। इसमें छुआछूत जातिगत भेदभाव का विरोध किया तथा स्त्रियों शूद्रों को भी यज्ञोपवीत धारण करने वेद पढ़नेका अधिकार दिया था। स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा रचित सत्यार्थ प्रकाश नामक ग्रन्थ आर्य समाज का मूल ग्रन्थ है। आर्य समाज काआदर्श वाक्य है: कृण्वन्तो विश्वमार्यम्, जिसका अर्थ हैविश्व को आर्य बनाते चलो।

प्रसिद्ध आर्य समाजी जनों में स्वामी दयानन्द सरस्वती, स्वामी श्रद्धानन्द, महात्मा हंसराज, लाला लाजपत राय, भाई परमानन्द, रामप्रसादबिस्मिल‘, पंडित गुरुदत्त, स्वामी आनन्दबोध सरस्वती, चौधरी छोटूराम, चौधरी चरण सिंह, पंडित वन्देमातरम रामचन्द्र राव आदिआते हैं।

आर्य समाज शिक्षा, समाजसुधार एवं राष्ट्रीयता का आन्दोलन था। भारत के 85 प्रतिशत स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, आर्य समाज ने पैदाकिया। स्वदेशी आन्दोलन का मूल सूत्रधार आर्यसमाज ही है।

स्वामी जी ने धर्म परिवर्तन कर चुके लोगों को पुन: हिंदू बनने की प्रेरणा देकर शुद्धि आंदोलन चलाया। आज विदेशों तथा योग जगत मेंनमस्ते शब्द का प्रयोग बहुत साधारण बात है। एक जमाने में इसका प्रचलन नहीं थाहिन्दू लोग भी ऐसा नहीं करते थे। आर्यसमाजियोने एकदूसरे को अभिवादन करने का ये तरीका प्रचलित किया। ये अब भारतीयों की पहचान बन चुका है।

 वस्तुतः आर्यसमाजियों द्वारा की गयी हिन्दीसेवा अद्वितीय है। 1886 में लाहौर में स्वामी दयानंद के अनुयायी लाला हंसराज ने दयानंदएंग्लो वैदिक कॉलेज की स्थापना की थी।

सन् 1901 में स्वामी श्रद्धानन्द ने कांगड़ी में गुरुकुल विद्यालय की स्थापना की।

अनेक आर्यसमाजी विदेशों में जाकर हिन्दुओं में हिन्दी भाषा एवं स्वातंत्र्यचेतना का प्रसार किया। आर्यसमाज ने भारत को संस्कृत, हिन्दी, इतिहास, विज्ञान और अन्यान्य विषयों के हजारों उत्कृष्ट विद्वान दिये।

आर्य समाज ने भारत में राष्ट्रवादी विचारधारा को आगे बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण योगदान किया है। इसके अनुयायियों ने भारतीय स्वतंत्रताआंदोलन में बढ़ चढ़ कर भाग लिया। आर्य समाज के प्रभाव से ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर स्वदेशी आन्दोलन आरम्भ हुआ था।

स्वामीजी आधुनिक भारत के धार्मिक नेताओं में प्रथम महापुरूष थे जिन्होनेस्वराज्यशब्द का प्रयोग किया। आर्य समाज ने हिन्दू धर्म मेंएक नयी चेतना का आरंभ किया था। स्वतंत्रता पूर्व काल में हिंदू समाज के नवजागरण और पुनरुत्थान आंदोलन के रूप में आर्य समाजसर्वाधिक शक्तिशाली आन्दोलन था।

यह पूरे पश्चिम और उत्तर भारत में सक्रिय था तथा सुप्त हिन्दू जाति को जागृत करने में संलग्न था। यहां तक कि आर्य समाजी प्रचारकफिजी, मारीशस, गयाना, ट्रिनिडाड, दक्षिण अफ्रीका में भी हिंदुओं को संगठित करने के उद्देश्य से पहुंच रहे थे। आर्य समाजियों ने सबसेबड़ा कार्य जाति व्यवस्था को तोड़ने और सभी हिन्दुओं में समानता का भाव जागृत करने का किया।

भारत को जिस तरह ब्रिटिश सरकार का आर्थिक उपनिवेश और बाद में राजनीतिक उपनिवेश बना दिया गया था, उसके विरूद्ध भारतीयोंकी ओर से तीव्र प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक थी। चूंकि भारत धीरेधीरे पश्चिमी विचारों की ओर बढ़ने लगा था, अतः प्रतिक्रियासामाजिक क्षेत्र से आना स्वाभाविक कार्य थी। यह प्रतिक्रिया 19वीं शताब्दी में उठ खड़े हुए सामाजिक सुधार आन्दोलनों के रूप मेंसामने आई। ऐसे ही समाज सुधार आंदोलनों में आर्यसमाज का नाम आता है।

आर्यसमाज ने विदेशी जुआ उतार फेंकने के लिए, समाज में स्वयं आंतरिक सुधार करके अपना कार्य किया। इसने आधुनिक भारत मेंप्रारम्भ हुए पुर्नजागरण को नई दिशा दी। साथ ही भारतीयों में भारतीयता को अपनाने, प्राचीन संस्कृति को मौलिक रूप में स्वीकार करने, पश्चिमी प्रभाव को विशुद्ध भारतीयता यानीवेदों की ओर लौटोके नारे के साथ समाप्त करने तथा सभी भारतीयों को एकताबद्ध करनेके लिए प्रेरित किया।

शिक्षा के क्षेत्र में गुरुकुल डीएवी कालेज स्थापित कर शिक्षा जगत में आर्यसमाज ने अग्रणी भूमिका निभाई। स्त्रीशिक्षा में आर्यसमाजका उल्लेखनीय योगदान रहा। 1885 के प्रारम्भ तक आर्यसमाज की अमृतसर शाखा ने दो महिला विद्यालयों की स्थापना की घोषणाकी थी तथा तीसरा कटरा डुला में प्रस्तावित था। 1880 के दौरान लाहौर आर्यसमाज महिला शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी बना हुआ था।

1889 0 में फिरोजपुर आर्यसमाज ने एक कन्या विद्यालय स्थापित किया था। यह क्रम बढ़ता रहा और बाद में सैकड़ों गुरुकुलों, डीएवी स्कूल और कॉलेजों में हिंदी भाषा को प्राथमिकता दी गई और इस कार्य के लिए नवीन पाठ्यक्रम की पुस्तकों की रचना हिंदीभाषा के माध्यम से गुरुकुल कांगड़ी एवं लाहौर आदि स्थानों पर हुई जिनके विषय विज्ञान, गणित, समाज शास्त्र, इतिहास आदि थे। यहएक अलग ही किस्म का हिन्दी भाषा में परीक्षण था जिसके वांछनीय परिणाम निकले।

आर्यसमाज ने भारत को संस्कृत, हिन्दी, समाजविज्ञान, इतिहास, विज्ञान के हजारों विद्वान दिए। आर्य समाज ने सामाजिक क्षेत्र में अनेकमहत्वपूर्ण सुधार कार्य किये थे। आर्य समाज के द्वारा बालविवाह, बहु विवाह, सती प्रथा, पर्दा प्रथा, जाति प्रथा, अशिक्षा, छुआछूतआदि सामाजिक बुराइयों का विरोध किया गया था। आर्य समाज में स्त्री शिक्षा, अंतर्जातीयविवाह, विधवा विवाह का समर्थन कियाथा।

पुस्तक में आर्य समाज के प्रमुख नियमों पर भी प्रकाश डाला गया है: ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र औरसृष्टिकर्ता है, उसी की उपासना करनी योग्य है।

मूलचंद मित्तल जी की रचित पुस्तक में इस बात की भी विवेचना की गई है कि किस प्रकार आर्य समाज का मुख्य उद्देश्य समस्त विश्वका कल्याण करना अर्थात सभी के लिए भौतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक समृद्धि प्राप्त करना है। सभी के प्रति हमारा आचरण प्रेमसे, धर्म के आदेशों से और उनकी स्थिति के अनुसार निर्देशित होना चाहिए। अज्ञान को दूर करना चाहिए और ज्ञान को बढ़ावा देनाचाहिए।

पेशे से उत्तर प्रदेश सरकार में बड़े सरकारी पदों पर रहे इंजीनियर मूलचंद मित्तल आर्य समाज को लेकर हमेशा हृदय एवं मस्तिष्क मेंविशेष दर्जा रखते थे। यही कारण है कि वो आर्य समाज के सामाजिक कार्यों और चिंतन को लेकर पूर्णतः सक्रिय रहे। और आखिरकारवर्षों के शोध के बाद उन्होंने एक ऐसी ऐतिहासिक पुस्तक को कलमबद्ध किया जो अपने आप में एक निष्पक्ष एवं समावेशी समाज कोलेकर मानवजगत को जागरूक करती है। पुस्तक का प्रकाशन पैनोरमा ग्राफिक्स ने किया है।

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